Tuesday, October 18, 2011

संक्षिप्त बायोडाटा

          


                         दिनांक ६ नवम्बर २०११ 
इण्डो-नेपाल महिला बाल साहित्यकार सम्मेलन एवं सम्मान समारोह-२०११
    संयोजक- बाल कल्याण एवं साहित्य शोध केन्द्र खटीमा (उ०ख०)

                                संक्षिप्त बायोडाटा

                      -डा. महाश्वेता चतुर्वेदी ( उ०प्र्० )
      हिन्दी,अंग्रेजी और संस्कृत में एम.ए.,साहित्याचार्य,संगीत प्रभाकर,डिप्लोमा इन योग 
एण्ड नैचुरोपैथी,डिप्लोमा इन जर्नलिज्म्, एल.एल.बी.,पी.एच.डी.और डी.लिट की उपाधियों
से विभूषित डा.महाश्वेता चतुर्वेदी,वर्तमान में बरेली के एक महिला पी जी कालेज में प्रोफेसर 
एंव शोध निदेशक के पद पर कार्यरत हैं |
     आपने हिन्दी,अंग्रेजी और संस्कृत में समान रूप से बृहद लेखन कर सौ के लगभग -
पुस्तकें और शोध सृजित किये हैं | यही नही आपके साहित्य पर भी दर्जन भर शोध हो चुके 
हैं | आप ग्यारह से अधिक देशों की साहित्यिक यात्रायें कर चुकी हैं | आप देश में बिरली 
हिन्दी और अंग्रेजी में निकलने वाली पत्रिका 'मन्दाकिनी' का सम्पादन भी करती हैं | बाल 
साहित्य में आपने श्रेष्ठ साहित्य का सृजन किया है और उसके लिये एक समर्पित संस्थान के 
रूप में आप कार्यरत हैं | आप इस परिचर्चा की मुख्य वक्ता हैं | आपको सम्मानित करने 
का अर्थ है संस्थान के हर सदस्य का सम्मान |











                              डा.प्रवेश सक्सेन (दिल्ली)
      डा.जाकिर हुसेन पी जी कालेज दिल्ली से एसोसियेट प्रोफेसर के पद से अवकाशप्राप्त 
डा सक्सेना कई संस्थानों में विजिटिंग प्रोफेसर के पद पर कार्य़रत हैं | आप कई शोध करा
चुकी हैं तथा बाल साहित्य के अतिरिक्त समग्र साहित्य में भी आप श्रेष्ठ लेखन के लिये सुवि-
ख्यात हैं | आप चार ग्रन्थों का सम्पादन एंव बीस से अधिक पुस्तकों की रचियता हैं |आपकी
'हंसता गाता बचपन'दिल्ली हिन्दी अकादमी से पुरुस्कृत बाल रचना है |आप दर्जन भर -
प्रतिष्ठत सम्मान प्राप्त कर चुकी हैं | आपका 'आम का पेड़ ' बाल कहानी ग्रन्थ प्रकाशनाधीन 
है | आपके लिये यह सम्मान प्रदान करना संस्थान का गौरव है |







       सुश्री सुर्कीति भटनागर - (पटियाला, पंजाब)
      पंजाब के पाकिस्तान में चले गये सियालकोट में जन्मी सुर्कीति जी बाल साहित्य के
के लिये समर्पित अहिन्दीभाषी प्रख्यात बाल साहित्यकार के रूप में स्थापित हैं | एम ए तक 
शिक्षा प्राप्त आप स्वतंत्र लेखिका हैं | अब तक आपके दस बाल कथा संग्रह,तीन बाल उपन्यास,
दो बाल गीत संग्रह तथा तीन सौ से अधिक बाल रचनायें पत्रिकाओं मे प्रकाशित हो चुकी हैं | 
समग्र साहित्य में भी तीन कथा संग्रह , दो लघु कथा संग्रह  तथा सौ से अधिक रचनायें
 प्रकाशित हो चुकी हैं | इस बर्ष का आपको 'महिला बाल साहित्य शिरोमणी ' का सम्मान 
देकर संस्थान स्वंय को गौरवान्वित अनुभव करता |
         आप राष्ट्रीय स्तर के लिये चालीस से अधिक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त कर चुकी हैं |
 भाषा विभाग पंजाब सरकार द्वारा आपके बाल कथा संग्रह को वर्ष २००६ का तथा वर्ष २००९ में
 बाल गीत संग्रह को , सर्वश्रेष्ठ बाल साहित्य का सम्मान प्राप्त हो चुके हैं | हिन्दी सभा सीतापुर
 भी आपके बाल उपन्यास को वर्ष २००९ का सर्वश्रेष्ठ बाल रचना का सम्मान प्रदान 
कर चुकी है | आपका सम्मान आपके सम्मान का प्रतीक़ न्हीं बल्कि संस्थान के गौरव का
प्रतीक है | 






         डा. के श्री लता  - तिरूवनन्त पुरम (केरल)   
       श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रादेशिक केन्द्र तिरूवनन्त पुरम में एसो- 
सियेट प्रोफेसर मलयालम भाषी श्रेष्ठ बाल साहित्य़ शोधकर्ता तथा साहित्यकार हैं |हिन्दी 
विभाग की प्राध्यापिका डा. श्रीलता ने हिन्दी में भी कुछ बाल रचनायें की हैं जो स्थानीय 
क्षेत्र में विशेष प्रशंषित हुयी हैं | आप वर्ष १९९४ से १९९८ तक लगातार पांच वर्ष तक केरल 
हिन्दी साहित्य अकादमी से एस बी टी साहित्य सम्मान प्राप्त कर चुकी है | आप राष्ट्रीय
हिन्दी साहित्य सम्मेलन का प्रोफेसर चन्द्र हासन सम्मान भी प्राप्त कर चुकी हैं |आपकी 
विभिन्न विषयों पर सात पुस्तके प्रकाशित हो चुकी हैं | विभिन्न पत्रिकाओं में भी आपकी
बाल रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं | कई विश्वविद्यालयों की विजिटिंग प्रोफेसर होने के साथ
ही आप विभिन्न सरकारी संस्थानों की विभिन्न समितियों में भी पदाधिकारी हैं | आप को 
सम्मानित करके संस्थान स्वंय को गौरवान्वित अनुभव करता है |






       डा.मिथलेश रोहतगी
      हिन्दी विभाग की प्रवक्ता,विभागाध्यक्ष तथा प्राचार्या महाविद्यालय पद पर रह चुकी डा.
रोहतगी प्रख्यात महिला शिक्षाविद के रूप में ख्यात रही हैं | आप ने विभिन्न विधाओं में 
साहित्य सृजन किया है | बच्चों के साहित्य के विकास में सतत प्रयत्नशील रहीं आपकी -
क्षमताओं का आकलन कर ही केन्द्र सरकार द्वारा आपको भारत के बाल साहित्यकारों का कोष
तैयार करने का गुरूतर भार प्रदान किया है |अनेक राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त कर चुकी हैं तथा-
अनेक शोध आपके निर्देशन में सम्पन्न हुये हैं | आपकी दो बाल कृतियां प्रकाशनाहीन हैं |
     आपका सम्मान अगली पीढी को प्रेरणा प्रदान करेगा ऐसा हमें विश्वास है |








              श्रीमती विमला रस्तोगी(दिल्ली) 
      सुप्रसिद्ध समाज सेवी एंव बाल साहित्यकार विमला जी की दो बाल कृतियां नेशनल 
बुक ट्र्स्ट से प्रकाशित हो चुकी हैं तथा कई कहानी संग्रह ,बाल एकांकी, तथा काव्य पुस्तकें
विभिन्न पुरूस्कार प्राप्त कर प्रकाशनाधीन हैं | तथा भारत सरकार के आपरेशन ब्लैक बोर्ड में
चयनित हो चुकी हैं |
      बीस के लगभग राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त विमला जी को सम्मानित कर संस्थान स्वंय 
को गौरवान्वित अनुभव करता है |








      सुश्री सुरेखा शर्मा 'शान्ति'(गुडगाँव) 
       हरियाणा निवासी सुरेखा जी समाज सेवी, हिन्दी सेवी और बाल साहित्य के लिये
समर्पित व्यक्तित्व की स्वामिनी हैं |देश में कार्यरत अनेक हिन्दी सेवी संस्थाओं की आप -
पदाधिकारी हैं तथा बाल कविताओं पर आपकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं | साहित्य 
की अन्य विधाओं पर भी आपका समान अधिकार है तथा इस क्षेत्र में भी आपकी एक अलग 
पह्चान है | आप लगभग बीस सम्मान प्राप्त कर चुकी हैं तथा आपका एक बा एकांकी संग्रह 
प्रकाशनाधीन है | 
       आपका सम्मान कर हम अनुग्रहित हैं |







        सुश्री उषा अग्रवाल  (महाराष्ट्र)    
       नागपुर (महाराष्ट्र् निवासी उषा जी ने यद्यपि अभी कुछ दिनों से ही बाल साहित्य के 
क्षेत्र मे पदार्पण किया है किन्तु हायकू और लघुकथा के क्षेत्र मे आप का बहुत सम्मानित नाम
है | आप बाल साहित्य की हर विधा मे लिख रही हैं और बहुत अच्छा लिख रही हैं | आप 
की कई बाल पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं  | आकाशवाणी और मंच से आप की रचनाओं का 
सतत प्रसारण होता रह्ता है |
        आपका सम्मान हम सब का गौरव है |







         ट्विंकल अग्रवाल (महाराष्ट्र)
       इस समारोह की सबसे कम आयु की ट्विंकल जी भी महाराष्ट्र से ही हैं तथा आप 
बाल साहित्य के क्षेत्र में कहने के लिये तो नवांगत किन्तु इन एक दो वर्षों में ही आपने 
बाल साहित्य के क्षेत्र में अपना एक अलग स्थान बनाया है | आप बहुमुखी प्रतिभासम्पन्न
युवा साहित्यकार हैं | 
      आपका सम्मान युवा पीढी का सम्मान है |





         सुश्री स्नेहलता (लखनऊ) 
      उत्तर रेलवे मण्डल कार्यालय लखनऊ में लेखाधिकारी के पद पर आसीन स्नेह लता 
जी का नाम साहित्यिक क्षेत्र में बड़े आदर के साथ लिया जाता है | आपकी विभिन्न विधा
में दस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी ह |जिनमे बालसाहित्य की चार पुस्तकें विशेष 
प्रशंसित रही हैं | उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ,बालसाहित्य संस्थान लखनऊ से विभिन्न-
सम्मानों के अतिरिक्त आपको अन्य संस्थानों से एक दर्जन से अधिक सम्मान प्राप्त हो चुके 
हैं |आकाश वाणी से आपकी बाल कविताओं का सतत प्रसारण होता है |
       आपका सम्मान संस्थान की एक बिशेष उपलब्धि है | गौरव है |

Monday, October 10, 2011

karnaa nishcht

       तुमको निश्चित करना है

जीवन पथ पर चलने से पहले , 
लक्ष्य तुम्हें  अब  चुनना  है |
करलो निश्चित करने  से पहले ,
क्या तुम को अब  बनना  है |

वीर सुभाष बनोगे   या  तुम,
बनोगे  वीर   शिवा  जी  से |
या   फिर राजस्थान- केशरी,
चाहो  कुछ  राणा  जी   से |

रामतीर्थ  बनना  चाहोगे, या-
भगत  सिंह  मतवाला   तुम |
सघन साधना कर   मीरा सी,
चाहो   बिष  का प्याला  तुम |

अगर चाहते    नेता   बनना,
लाल  बहादुर   सा    भय्या |
दे  कर  जान  बचाया जिसने,
भारत   का गौरव     भय्या |

कहो बनोगे क्या तुम  बच्चो , 
अभी करो यह निश्चित   तुम |
वरना बहुत    देर  हो  जाए,
फिर कब  कर  पाओगे  तुम |

Saturday, October 8, 2011

kavya sameekshaa

                     समीक्षा
        हिन्दी विश्व गौरव ग्रंथ की दूसरी कड़ी के रूप में 'काव्य कुसुमाजंलि" सम्पादन की
अदभुत क्षमता से परिपूरित डा.मेहरोत्रा की हिन्दी जगत को पहली कड़ी में स्थापित की गई
गौरवशाली परम्परा क़ी  अतिश्रेष्ठ पुनरावृति है | प्रथम प्रसून में स्थापित प्रतिमानों से भी 
आगे बढ कर "काव्याजंलि" देव्-प्रसून बना कर की गई प्रस्तुति है जो अदभुत औरअनुकरणीय
 तो है ही एक सर्वथा सार्थक प्रयास भी है |
       १०७ पृष्ठो और ६ अध्यायों में मानो सम्पूर्ण हिन्दी काव्यधारा को समेटने का भगी-
रथ प्रयास किया गया है जो सफल भी रहा है |
       काव्यांजलि में बड़ी संख्या मॅ विदेशी हिन्दी मनीषियों और विदुषियों की चुनी हुई 
श्रेष्ठ कविताओं का संकलन मेहरोत्रा जी की संतुलित उद्दाम विद्वतता और सम्पादन क्षमता का
 अनवरत प्रदर्शन है| अपनी संकलन क्षमता का तात्विक प्रदर्शन जाने- अजाने में वे कर ही बैठे वरना
देश विदेश के लगभग एक सौ काव्य - कलमकारों के मात्र हिन्दी महिमा पर २२० से अधिक 
गीतों और कविताओं का श्रेष्ठ संकलन कितना दुष्कर कार्य है इसकी पीड़ा कोई संग्रहकर्ता  या 
संपादक, समय व्ययी और परिष्कृत सुबुद्दि का आयोजक ही जान सकता है |इस क्रम में यह 
इंगित करना भी अत्यावश्यक है कि हर अध्याय के बाद एक हिन्दी मनीषी को श्रद्धान्जलि ने
जहां समय की समग्र मांग का अनुशीलन किया है वहीं ग्रंथ की छवि को चार चांद लगाने का
सद्प्रयास भी |
       हिन्दी महिमा समग्र रचनाओं का २० भारतीय भाषाओं में अनुवाद इस गौरवग्रंथ के
महिमामण्डन में एक शिलालेख अंकन सिद्द होगा यह मेरी संकल्पना का अंश है |आज भी -
बिरले को छोड़ कर हिन्दी का नवोदित कवि भी स्वंय को सर्वश्रेष्ठ और राष्ट्र कवि से भी ऊपर 
समझता है ऐसे विपरीत समय में भारत ही नहीं मारीशस के भी घोषित राष्ट्र कवि डा.ब्रजेन्द्र 
कुमार भगत की हिन्दी महिमामण्डन मात्र पर सृजित लगभग ५० कविताओं का श्रमसाध्य 
संकलन एक अदभुत सार्थक सोच का पर्याय तो है ही सम्पूर्ण सोच की दिशा भी इंगित करता है |
        कुल मिला कर यह ग्रंथ भी मेहरोत्रा जी द्वारा गढी परम्परा में एक उज्ज्वल मील का 
पत्थर तो बनेगा ही,अगली पीढी के लिये धरोहर और प्रमाण भी बनेगा ऐसी मेरी सतत्
संकल्पना  है | मेहरोत्रा जी इस साहित्यिक परम्परा को निर्बाध रूप से आगे बढायेंगे ऐसी मेरी
 अटल सोच है | जय हिन्द |    

Tuesday, October 4, 2011

samarpan

समर्पण
'बाल गंगा' का समर्पण,
 आपको , श्री-मान है |
 है नहीं संजाल शब्दों का,
 हृदय    का  गान है |

 बालपन में लौट  कर जो-,
 कुछ स्वंय अनुभव किया |
 भाव वह मैंने   यथावत ,
 हर समर्पण कर   दिया |

 बालकविता ,  काव्य का-,
 मुझको नहीं कुछ ज्ञान है |
 किस तरह रस-छंद डालूं,
 बिलकुल  नहीं   संज्ञान है |

 किंचित नहीं, मैं भिज्ञ हूँ,
 किस भाव से दूं आपको |
 मित्रवत बस कर रहा हूं,
 भेंट  यह  श्री-मान को |

 आप चाहें तो हृदय इसको-,
 लगा    कर     तार   दें |
 खुद पढें, सबको पढा कर,
 एक   नया  विस्तार  दें | 
             -डा.राज सक्सेना 

Monday, October 3, 2011

dukhiyon par dayaa

      दुखियों पर दया
पशुओं पर दया नहीं जिसको,
वह पशुवत है इन्सान  नहीं |
अपनापन पशु से रखता हो, 
वह ही मानव, इंसान वही |

देकर दधीचि ने अस्थि-दान,
मानवकुल का कल्याण किया |
शिवि ने बहेलिये निष्ठुर  को,
खग रक्षा में निजमांस दिया |
जो काम और के आ  जाये,
लगता है तब भगवान वही |
अपनापन पशु से रखता हो, 
वह ही मानव, इंसान वही |

महाराज रन्तिदेव ने अपना, 
भोजन तक सबको दे डाला |
भगवान बुद्ध ने दुखहरण हेतु,
एक नया धर्म ही रच डाला |
सम्पूर्ण राज्य और वैभव का,
समझा कणभर भी मूल्य नहीं |
अपनापन पशु से रखता हो, 
वह ही मानव, इंसान वही |

ईसामसीह ने आगे बढ कर,
संदेश दिया था जनता  को |
तीर्थंकर महावीर श्री स्वामी ने,
था श्रेष्ठ कहा इस क्षमता को |
जितने भी महापुरुष जग के,
कहते  रहते थे बात  यही |
अपनापन पशु से रखता हो, 
वह ही मानव, इंसान वही |

गांधी ने इस युग में आकर, 
इस दया भाव को अपनाया |
आदर्श बने इस के कारण ,
जिसको जग भर ने अपनाया |
उन्नति का है यह मूलमंत्र ,
संशय इसमें है नहीं  कहीं |
अपनापन पशु से रखता हो, 
वह ही मानव, इंसान वही |  

Saturday, October 1, 2011

baal gangaa

   

समर्पण
'बाल गंगा' का समर्पण,
 आपको , श्री-मान है |
 है नहीं संजाल शब्दों का,
 हृदय    का  गान है |

 बालपन में लौट  कर जो-,
 कुछ स्वंय अनुभव किया |
 भाव वह मैंने   यथावत ,
 हर समर्पण कर   दिया |

 बालकविता ,  काव्य का-,
 मुझको नहीं कुछ ज्ञान है |
 किस तरह रस-छंद डालूं,
 बिल्कुल  नहीं  संज्ञान है |

 किंचित नहीं,मैं  भिज्ञ हूं,
 किस भाव से दूं आपको |
 मित्रवत बस कर रहा हूं,
 भेंट  यह  श्री-मान को |

 आप चाहें तो हृदय इसको-,
 लगा    कर   तार   दें |
 खुद पढें, सबको पढा कर,
 एक   नया  विस्तार  दें |
             -डा.राज सक्सेना
     सरस्वती-वन्दना
शारदे कुछ इस तरह का,अब मुझे वरदान दे |
निज चरण में बैठने का,अल्प सा  स्थान दे |
      साहित्य-गंगा से लबालब,
      मस्तिष्क को आपूर्ति  दे |
      हो जनन साहित्य   नव,
      यह श्रेष्ठतम स्फूर्ति   दे  |
गीत गंगा को मेरी,नित-नित नये आयाम दे |
निज चरण में बैठने का,अल्प सा  स्थान दे |
      हो सृजन सबसे  अनूठा,
      प्रेम की  रस-धार  हो |
      शब्द हों आपूर्त रस  में,
      अक्षरों में   प्यार  हो  |
मधु सरीखा कंठ दे, रस-पूर्ण मंगलगान  दे |
निज चरण में बैठने का,अल्प सा  स्थान दे |
      त्याग-मय जीवन  मिले,
      निर्लिप्त मन मन्दिर रहे |
      प्रेम-पूरित हों वचन सब,
      जिनको यह जिव्हा  कहे |
गंध सा फैले जगत में,वह मुझे यश-मान दे |
निज चरण में बैठने का,अल्प सा  स्थान दे |



दूर गगन से आती चिड़िया |
सबके मन को भाती चिड़िया |
मीठी तान सुनाती चिड़िया-,
मधुर स्वरों में गाती चिड़िया |

आंगन में आ जाती चिड़िया |
फुदक-फुदक उड़ जाती चिड़िया |
दिखे अन्न  का  दाना कोई,
ठीक वहीं पर जाती  चिड़िया |

आ कर नाच दिखाती चिड़िया |
फिर सीढ़ी चढ़  जाती चिड़िया |
आगे - पीछे  मां के  जाकर ,
उनका मन बहलाती  चिड़िया |

फिर करतब दिखलाती चिड़िया |
चोंच में दाना   लाती चिड़िया |
पहुंच घोंसले नवजात बुलाकर-,
दाना उन्हें खिलाती  चिड़िया  |

मां कोई हो, पशु या चिड़िया |
बच्चे   शैतानी   की पुड़िया |
देते कुछ दुख अपनी मां को ,
मां सबकुछ सह लेती दुखिया |



      हरित बनाएं
पप्पू,टिल्लू,कल्लू, राजा |
नया खेल एक खेलें आजा |
ना तुरही,ना तबला कुछ भी,
ना शहनाई ना  कोई बाजा |

नया वर्ष इस तरह  मनाएं |
पूर्ण नगर नव हरित बनाएं |
नए-नए हितकारी  पौधे-,
हर घर में इस वर्ष लगाएं |

हर घर में फलदार वृक्ष हो |
जिसका हर रसदार पक्ष हो |
हर बच्चा दस पेड़ लगाए-,
हम सबका इसबार लक्ष हो |

तीन वर्ष में जब फल आएं |
खुद खाएं मित्रों को खिलाएं |
पास पड़ौस में बांटें सबको,
सबको सुन्दर स्वस्थ बनाएं |



       जन्म-दिवस
              -डा.राज सक्सेना
जन्म दिवस की तुम्हें बधाई,
जिओ     सैकड़ों     साल |
जीवन हो पल-पल आनन्दित,
हो   उन्नत   नित   भाल |

टूट कर सुख-समृद्धि  बरसे,
वन उपवन सा जीवन महके |
कहीं शोक की  पड़े न छाया,
मन का पक्षी खुलकर चहके |

क्रमशः होते जाएं  कर   से,
नित्-नित  नये    कमाल |
जीवन हो पल-पल आनन्दित,
हो   उन्नत   नित   भाल |
दोस्त     फुलाएं     गाल |
जन्म दिवस की तुम्हें बधाई,
जिओ     सैकड़ों     साल |

दुनिया के ऐश्वर्य प्राप्त   कर,
शिक्षा  के प्रतिमान प्राप्तकर |
एक सफल व्यक्तित्व बनो तुम,
हैं जितने सम्मान  प्राप्त कर |

शक्ति तुम्हें दे ईश्वर   इतनी,
रक्खो   इन्हें      सम्हाल |
जन्म दिवस की तुम्हें बधाई,
जिओ     सैकड़ों     साल |

बैर   किसी से कभी बने ना,
संक्ट आये  किन्तू टिके  ना |
स्वस्थ और सम्पन्न रहॉ तुम्,
होठो से, मुस्कान  मिटे  ना |

क्रमशः होते   जाएं   कर से,
नित-नित नये      कमाल |
जन्म दिवस की तुम्हें बधाई,
जिओ     सैकड़ों     साल |



       नेहरू बन जाऊं
               -डा.राज सक्सेना
नेहरू जैसा देश चला कर,
मैं भी नाम    कमाऊं |
मम्मी मुझे बताओ कैसे,
मै नेहरू   बन   जाऊं |

मिलकर रहें एकता से सब,
बंधें  सूत्र में   कस  कर |
अगर देश पर संकट  आए,
जूझें उससे    डट   कर |

दुनिया का आदर्श देश  हो,
ऐसा इसे        बनाऊं |
अचकन टोपी पहन जेब में,
लाल गुलाब      लगाऊं |

बाल दिवस पर अपने जैसे,
सब बच्चे      बुलवाऊं  |
जन्मदिवस चाचा नेहरू का,
सबके साथ     मनाऊं   |

हो समान पालन और शिक्षा,
 ऐसे नियम    बनाऊं  |
चाचा के सपनों का भारत,
मैं साकार      बनाऊं   |



       एक सवाल
            - डा.राज सक्सेना
एक पुत्र ने,निश्छल मन से,
किया पिता से एक  सवाल |
हिन्दू-मुस्लिम होते क्या हैं,
कभी-कभी क्यों करें बबाल |

पापा बोले धर्म  अलग   है,
कुछ आचार नहीं मिलते  हैं |
सामाजिक कुछ नियम अलग है,
मूल विचार नहीं  मिलते  हैं |

मन्दिर में हिन्दू   की  पूजा,
मस्जिद में मुस्लिमी नमाज |
हिन्दू रखें अनेकों,एक माह के-,
रोजे रखता , तुर्क   समाज |

'पापा मन्दिर' बोला  बेटा,
का निर्माण ,करे  भगवान  |
या फिर रचना हर मस्जिद की,
आकर खुद करता  रहमान |

सब धर्मी  मजदूर   मिस्त्री,
मिल कर इनको यहां बनाते |
बन कर पूरा, होते ही क्यों,
दोनों अलग-अलग हो  जाते |

हिन्दू कहता ईश   एक  है,
मुस्लिम कहता  एक खुदा |
जैन,बौद्ध और सिख,ईसाई,
मिलकर भी क्यों रहें  जुदा |

बच्चे हम सब एक पिता के,
ना पूजा घर एक बनाते  |
हमसब के त्योहार अलग क्यों,
मिलकर हम क्यों नहीं मनाते |

ईश पिता जब एक  सभी का,
फिर तनाव की बात कहां  है |
सबका ईश्वर एक  जगत  में,
सबकी धरती एक  जहां   है |

रक्त एक सा, शक्ल  एक सी,
सब कहते  हम  हिन्दुस्तानी |
बच्चे मिलकर गले आज सब,
भूल जायं हर  बात  पुरानी |

भारत के बच्चों  को मिलकर,
काम अभी इतना  करना है |
एक नए  आदर्श देश   को,
हम सबने मिलकर रचना है |  



      हिमालय
          - डा.राज सक्सेना

भारत मां के राज मुकुट सा,सर पर जड़ा हिमालय |
जय जवान सा रक्षक बन कर,तत्पर खड़ा हिमालय |

अविरल देकर नीर नदी को,करता भरित हिमालय |
खेत उगलते सोना जिससे,करता हरित  हिमालय |

झेल रहा बर्फीली आंधी, इधर  न आने   देता-,
कष्ट सभी अपने ऊपर ही, बिना कहे  ले  लेता |

सागर से उठते बादल को,  पार न  होने  देता |
भारत में बरसा कर बादल. जलधि न खोने देता |

देता रहता  खनिज हमेशा, भारत धनिक बनाने,
सघन वनों को परिपूरित कर,जीवन सुखद बनाने |

किन्तु नहीं हम जीने देते, इसको  जीवन   इसका |
धीरे-धीरे अंग भंग  कर.  कुतर-कुतर तन इसका |

कसम एक सब मिलकर खाएं,हरा-भ्ररा हम इसे बनाएं,
लेता नहीं कभी बस देता, स्वर्णिम इसका  रूप बनाएं |
  धनवर्षा,हनुमानमन्दिर्,ख्टीमा-२६२३०८(उ०ख०)
          मो- ०९४१०७१८७७७



      नहीं समझते कम
                -डा.राज सक्सेना

हम सूरज और तारे हम,खुद को नहीं समझते कम |
संशय अगर किसी के मन में,आकर हमें दिखाले दम |

हम भारत का मान रखेंगे,ऊंची इसकी शान रखेंगे |
झण्डा है पहचान हमारी,झण्डे का सम्मान  रखेंगे |
तूफानों को रोकेंगे हम,खुद को नहीं समझते  कम |
संशय अगर किसी के मन में,आकर हमें दिखाले दम |

जात-पांत से दूर रहेंगे,प्रेम-भाव भरपूर   रखेंगे |
कितने बड़े पदों पर पहुंचें,ना सत्ता मद्-चूर रहेंगे |
ना धोखा दें, ना खाएं हम,खुद को नहीं समझते कम |
संशय अगर किसी के मन में,आकर हमें दिखाले दम |

विश्व गुरू भारत बन जाए,जन-गण-मन को गले लगाए |
कठिन परिश्रम करके ही तो,प्रजातन्त्र जन-जन तक जाए |
सम अधिकार दिला दें हम,नहीं समझते खुद को कम |
संशय अगर किसी के मन में,आकर हमें दिखाले दम |

  धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-२६२३०८(उ०ख०)
        मो- ०९४१०७१८७७७



       आदर्श दिन-चर्या
                -डा.राज सक्सेना

सुबह सवेरे उठना बेटा,हल्की कसरत   करना बेटा |
छूना पैर बड़े जितने हों,तभी काम कुछ करना बेटा |

सही तरीके से ब्रश करना,दांत साफ पानी से करना |
मुखधोलो तब जाओनहाने,आकर उचित नाश्ता करना |

कलका पढ़ा पुनः दोहराओ,आज है पढ़ना नज़रफिराओ |
फिर शाला की करो तैयारी,बैग ढ़ंग से पुनः  लगाओ |

पूरी ड्रेस पहन कर आओ,बैग टांग कन्धे पर ले जाओ |
पंक्तिलगा बस में तुम चढ़ना,पंक्ति बना शाला में जाओ |

कक्षा में तुम ध्यान लगाकर,मन पढने में पूर्ण जमाकर |
नोट करो जो नोट करायें,अलग अलग गृहकार्य लगाकर |

हो छुट्टी मत दौड़ लगाओ,लगा पंक्ति बस मे चढ़ जाओ |
घर  आए  आराम से उतरो,दोनो ओर देख घर   जाओ |

लेलो नाश्ता मां से  खाओ,धमा-चौकड़ी  नहीं मचाओ  |  
सुनो बात भी जो वह कहती,होकर फ्रैश खेलने  जाओ |

खेल खत्मकर वापस आओ,गृह का पूर्ण कार्य निबटाओ |
खाना खा बिस्तर पर जाओ, करो बन्द आंखें सो जाओ |

  धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-२६२३०८(उ०ख०)
  मो- ०९४१०७१८७७७



    ट्रैफिक रूल्स बताएं
                -डा.राज सक्सेना
आओ बच्चों खेल खिलाएं |
चलना सड़कों पर सिखलाएं |
चलें सड़क पर अगर नियम से,
तभी सुरक्षित जीवन पाएं |

चलें सड़क पर अपने बांए |
बिना जरूरत पार न जाऍ |
बांए-दांए रहें   देखते -,
सजग रहें और चलते जाएं |

करना पार , जेब्रा पर जाएं |
देखें अपने , दाएं- बांए |
रुकता ट्रैफिक होता सिगनल,
सड़क क्रास तब हम कर पाएं |
मन मर्जी न कभी चलाएं ,
तभी सुरक्षित जीवन पाएं |

एक पंक्ति हर जगह लिखी है |
दुर्घटना  से  देर   भली है |
हबड़-तबड़ करती दुर्घटना ,
जगह-जगह पर मौत खड़ी है |
सिगनल पालन साध्य बनाएं |
तभी सुरक्षित जीवन पाएं |

स्वर्ग-लोक का टिकट कटाना |
ड्राइव करते,  फोन  उठाना |
मिले अगर अर्जेन्ट काल तो,
रुको वहीं तब फोन  उठाना |
करके अपनी गाड़ी    बांए |
तभी सुरक्षित जीवन पाएं |

 धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,
खटीमा -२६२३०८ (उ०ख०)
 मो- ०९४१०७१८७७७



      आज सुना एक नई कहानी
                       -डा.राज सक्सेना

चांद- सितारे, परी-सुहानी,
एक था राजा,एक थी रानी |
कान पके यह सुनते-सुनते,
नहीं सुनेंगे,चुप जा  नानी |
आज सुना एक नई कहानी |

भारत का इतिहास  बता दे,
अश्वमेध क्या था  बतलादे |
भारत का किस पर शासन था,
क्यों टूटा साम्राज्य  बतादे |
किस स्तर पर थी नाकामी,
वर्ष आठ सौ सही गुलामी |
आज सुना एक नई कहानी |

सोने की चिड़िया कहलाया,
जगत्-गुरू कैसे बन पाया |
धर्म यहीं पर कैसे  जन्मे,
फिर विस्तार कहां से पाया |
नष्ट हुआ सब फिर भी अपनी,
बची संस्कृति  रही पुरानी |
आज सुना एक नई कहानी |

सभी क्षेत्र में था जब न्यारा,
कहां गया इतिहास  हमारा |
मुगलों,अंग्रेजों से पहले,
था भारत  सारा  नाकारा |
हवा महल थे क्या सब ज्ञानी,
या था सारा ही  अज्ञानी |
आज सुना एक नई कहानी |

धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-२६२३०८
 मो- ०९४१०७१८७७७



      बाल-दिवस पर सुनले नानी
                       -डा.राज सक्सेना
बाल-दिवस पर सुनले नानी |
कसम तुझे जो बात न मानी |
नई कहानी कह अनजानी ,-
करो खत्म यह राजा-रानी |

आज़ादी की कथा सुनाओ |
भगतसिंह क्या थे बतलाओ |
झांसी की रानी कैसी थी,
उसकी पूरी कथा बताओ |
कहां लड़ी थी वह मरदानी,
करो खत्म यह राजा-रानी |


सावरकर क्यों जेल गये थे |
स्वंय जान पर खेल गये थे |
असहयोग का मतलब क्या था,
भरने क्यों सब जेल गये थे |
क्यों पड़ती थी लाठी खानी |
करो खत्म यह राजा-रानी |


मिली युद्ध बिन क्यों आज़ादी |
क्यों पहनी थी सबने खादी |
लोगों ने क्यों छोड़ा वैभव ,
जीवन शैली क्यों की  सादी |
क्यों सबने मरने  की ठानी ,
करो खत्म यह राजा-रानी |


बाल-दिवस कैसे यह आया |
किसने इसको प्रथम मनाया |
इस दिन को किसने बच्चों का,
अपना दिन घोषित कर वाया |
कह कलाम की कथा-कहानी,
करो खत्म यह राजा-रानी |

धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-262308
मो- 09410718777


   बाल् दोहे और कतात 
             -ड़ा.राज सक्सेना
मेरे मासूम से बच्चे,गज़ब क्या कर दिया तुमने |
सजाकर एक अच्छा सा,गुलिस्तां धर दिया तुमने |
अजब सा खेल खेला है,अजब जादूगरी की है -,
सरल कविता में प्राणों को,गले से भरदिया तुमने |
         -०-
अभी दिखता है अपनापन,हमें कविता से रिश्ते में |
झलकता है अजब , उन्माद जैसा इन बहिश्तों में |
नये कवि आज जैसे छू रहे हैं सूर्य को जाकर -,
बहुत सम्भावनाएं दिख रही  हैं,  इन फरिश्तों में |
         -०-



       सूरज तुम क्यों रोज निकलते
                      डा.राज सक्सेना
सूरज तुम क्यों रोज निकलते,छुट्टी कभी नहीं क्यों जाते |
सातों दिन छुट्टी पर रह कर,नियमों की क्यों ह्सीं उड़ाते |
भोर हुई मां चिल्ला उठती ,उठ बेटा सूरज उग आया-,
आंखें खोलो झप्-झप जातीं,सिकुड़ सिमट अलसाती काया |
सिर्फ तुम्ही हो जिसके कारण,नींद नहीं पूरी हो पाती,
क्लास रूम में बैठे-बैठे , अनचाहे झपकी आ जाती |
सूरज तुम स्वामी हो सबके, नियमों का कुछ पालन करलो |
एक दिवस बस सोमवार को,छुट्टी तुम निर्धारित करलो |
नहीं उगे तो छुट्टी अपनी, सण्डे संग मण्डे की होगी,
जीभर सो ले दो दिन तक तो, फिक्र नहीं डण्डे की होगी |

संभव ना हो किसी तरह ये, इतना तो तुम कल से करना,
थोडा सो लें अधिक देर हम, कल से तुम नौ बजे निकलना |
   धन वर्षा,हनुमान मन्दिर, खटीमा-२६२३०८ (उ०ख०)
    मोबा०- ०९४१०७१८७७७



       रविवार आयेगा
               - राज सक्सेना

दिन की भागदौड़ से थक कर ,
सूरज जब घर जाता |
चन्दा, लेकर बहुत सितारे,
नभ में नित आ जाता |

आंख-मिचौली क्यौ होती यह ,
समझ नहीं मै पाता |
और न समझें मां-पापा भी,
भय्या चुप रह जाता |

ऐक दिवस जब दादा-दादी ,
हमसे मिलने आये |
मैने सारे प्रश्न सामने ,
उनके यह दोहराये |

सुन कर दादा-दादी बोले ,
कारण बहुत सरल है |
सूरज को घर भेजा जाता,
लाना उसको कल है |

ना जाये जो घर पर सूरज ,
कल कैसे लायेगा |
छैः कल बीतें तो छुट्टी का,
वार रवि आयेगा |

  -धनवर्षा,हनुमानमन्दिर ,
खटीमा-२६२३०८(उत्तराखण्ड)
मो-०९४१०७१८७७७



  आज़ादी सुन बात मेरी
          - डा.राज सक्सेना

ऐ आज़ादी सुन बात मेरी,मैं तुझको सत्य दिखाता हूं |
चढ़ तू जिन कन्धों पर आई,मैं उनकी व्यथा बताता हूं |

ये स्लमबस्ती है भारत की,इसको सब कहते हैं कलंक |
कितनी कोठी खाली-सूनी,दिन-रात यहां मनता बसंत |

परिवार आठ का रह्ता है,एक आठ-आठ के कमरे में |
पीढ़ी कमरे में जनी कई, त्यौहार  मने सब कमरे में |

कमरे से बाहर एक बच्चा,जो पुण्य धरोहर हम सब की |
खाना तलाशता कूड़े से, कुछ भूख मिटे उसके तन की |

बच्ची बारह की होते ही, बाई हो जाती    कोठी   में |
अनचाहे या बेबस होकर, इज़्ज़त लुटवाती  कोटी   में |

टी बी से ग्रसित दादा-दादी,तिल-तिलकर मरते जाते हैं |
आज़ाद मुल्क में दवा बिना,फुटपाथों पर   मर जाते हैं |

धन सिमटगया कुछ खातोंमें,आधिक्यहुआ कुछ चीजों का |
अधिसंख्य अभावसे ग्रसित यहां,अडडा हरसड़क कनीजों का |

रिश्वतखोरी का आलम यह,बिन रिश्वत काम न  होता है |
जिनको रक्खा है  काम हेतु,हर  टांग पसारे   सोता  है |

मंत्री,पी एम ओ झूठ कहे,सब छिपे भेड़ की खालों   में |
उदघाट्न तक सड्कें चलतीं,पुल गिर जाते कुछ सालों में |

बस यही रास्ता बचता है , झण्डा  लेकर अब  हाथों में |
उठ समरभूमि में कूद पडो, घुस जाओ भ्रष्ठ  ठिकानों में

   धनवर्षा,हनुमान मन्दिर खटीमा-२६२३०८(उ०ख्०)
     मो- ०९४१०७१८७७७


     बाल्-दोहे एंव् कतआत 
               -डा.राज सक्सेना

निर्मल्-निश्छल आंख में,स्वपनों का परिलेख |
कालजयी हो जाएगा, इनका   हर अभिलेख |
          -०-
शब्द चित्र रचते मगर,शब्द्-जाल से दूर |
शब्दों में शब्दान्वित,निहित अर्थ भरपूर |
         -०-
उतर गहराई में मन की,अचेतन कल्पना है ये |
कहें कविता इसे कैसे,विरल परि-कल्पना है ये |
         -०-
कठिन पान्डित्यप्रदर्शन,नहीं है बालकविता में | 
अहम् के सर्प का दंशन,नहीं है बालकविता में |
ये सपनों का समर्पण है,जो भोली आंख ने देखे,
किसी कविदर्प का दर्शन्,नहीं है बालकविता में |
         -०-
जहां तक हम नहीं पहुंचे,वहां तक ये पहुंचते हैं |
हमारे दिल के दर्दों से,नयन  इनके छलकते हैं |
हम अपने स्वार्थ कविता मे,न चाहे डाल देते हैं,
ये कविता में अचेतन सी,महक बनकर महकते हैं |
            -०-
अलंकारिक नहीं भाषा,न भावों का पुलिन्दा है |
प्रशंसा से परे हैं ये,न इनमें कोई  निन्दा  है |
सरल भाषा में ये दिलपर,लिखा करते हैं भावों को,
ये पिंजरे में नहीं पलता,खुले नभ का परिन्दा है |
           -०-
है निर्मल गंध सी इनमे,जो शब्दों में महकती है |
है भावों की विरल गंगा,जो छन्दों मे छलकती है |
सरलता,सौम्यता का ये,अनूठा एक संगम   है-,
मगर कविता में छुप कर एक चिंगारी दहकती है |
          -०-           



    अविरल टूर बनाएगा
             -डा.राज सक्सेना

मां पहिये लगवाले घर में,
सचल भवन हो   जाएगा |
पापा रखलें एक ड्राइवर ,
जो हर जगह    घुमाएगा |

स्टेशन,बस अड्डे सबकी,
बचेंगे     मारा-मारी से |
पन्द्र्ह दिन तक होनेवाली,
थकन भरी     तैयारी से |
पूसी,टामी,मिट्ठू के संग ,
छुट्टू चूहा       जाएगा |
अविरल टूर     बनाएगा |

पापा-मम्मी साथ   रहेंगे,
दीदी  साथ      निभाएगी |
दादा-दादी छूट न   पाएं,
नानी      भी आ जाएगी  |
प्यारा भय्या अर्जुन  मेरा,
साथ घूम कर    आएगा |
अविरल टूर     बनाएगा |

लेह और लद्दाख घूम कर,
श्री-नगर    हम   जाएंगे  |
वहां गए तो अमरनाथ के,
दर्शन  भी   कर   आएंगे  |
झझंट नहीं गरमपानी का,
गीज़र साथ   निभाएगा |
अविरल टूर     बनाएगा |

जयपुर से अजमेर घूमकर,
जायेंगे हम दिल्ली    को |
कनाट प्लेस पर चाट्पकौड़ी,
ला दें पूसी    बिल्ली को |
उसको खाते देख भौंक-कर ,
टामी   शोर    मचाएगा |
अविरल टूर     बनाएगा |

लखनऊ अपना देखा-भाला,
कर्नाट्क हो      आएंगे |
विधानसभा कैसी लगती है,
फोटो   वहां    खिंचाएंगे |
मिट्ठू तोता करे नमस्ते ,
छुट्टू भी    चिंचियाएगा |
अविरल टूर     बनाएगा |

सीधे-सीधे केप्-कमोरिन ,
कन्याअन्तरीप पर जाएँ   |
बैठ विवेकानन्द शिला पर,
राष्ट्र-गीत भारत का गायें  |
बिनारुके घर्  सीधा वापस,
"दूरान्तो"  सा   आएगा
अविरल टूर     बनाएगा |
  धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,
  खटीमा - २६२३०८(उ०ख०)



ये नन्हे कवि कहां से खींच कर,यह इत्र लाते हैं |
अनोखी कल्पना,भावों की सरगम मित्र  लाते हैं |
ये अनगढ हैं मगर इनमें,बहुत प्रतिभा झलकती है,
ये शब्दों से रचे अपने,विरल से चित्र   लाते हैं |
         -०-
कहां की बात को लाकर,कहां पर रख दिया तुमने |
यहां पर शब्द का दरिया,बहा कर रख दिया तुमने |
बड़े आसान शब्दों में,इबारत दिल पे लिख दी है,
कहां से भाव लाए हो,हिला कर रख दिया  तुमने |
           -०-
ये नन्हे तीर कविता के,दिलों पर वार करते हैं |
युगों की वर्जनाओं का,सरल    संहार करते हैं |
न इनपर शब्द ज्यादा हैं,न भावों की बड़ी गठरी,
ये इस युगकी सरलकविता,फसल तैयार करते हैं |
            -०-
पुरानी लीक पर  चलना, कभी  हमको  नहीं  भाया |
विगत गुणगान से कुछ भी,किसी को मिल नहीं पाया |
नये पथ हम  तलाशेंगे,शिखर की ओर जाने के -,
रखे हाथों को हाथों पर ,कभी कुछ  मिल नहीं  पाया |
           -०-
उठो उठ कर तलाशें हम,नई सम्भावनाओं  को |
करें जी तोड़कर हम अब,नई नित साधनाओं को |
सरलजीवन,सघनवैभव,अधिक आराम तलबी भी,
हटाकर अपने जीवन से,मिटा दें वासनाओं   को |
           -०-
हमारे दिल में पुरखों का,अभी भी ख्वाब बाकी है |
इसी से आंख में अपनी, हया की  आब बाकी है |
मुहब्बत उठ गई शहरों से लेकिन गांव में अब भी,
पुरानी रस्म जिन्दा है,अदब-आदाब   बाकी  है |
             -०-
उदर में आसमानों से, सहेजा बन्द अबरों को |
उतर गहराई में दिल की,कुरेदा कुन्द ज़बरों को|
प्रसवपीड़ा सही जो"राज",उसकी टीस सह-सह कर,
निचोड़ा दर्द दिल का तो,रचा है चन्द सतरों को |
            -०-
  धनवर्षा,हनुमानमन्दिर,खटीमा-२६२३०८(उ०ख०)


       गणतन्त्र हमारा
                - डा.राज सक्सेना

भिन्न सभी से सबसे न्यारा,भारत का गणतन्त्र हमारा |
बना विश्व में श्रेष्ठ सभी से,हमें जान से है ये   प्यारा |

छब्बीस जनवरी का स्वर्णिमदिन,लेकर खुशियां आया अनगिन |
इस दिन से मुडकर न देखा, करता देश तरक्की  प्रति-दिन |
देख रहा विस्मित जग सारा,भारत का गणतन्त्र हमारा |

अंतिमजन तक किया सम्रर्पित,किया प्रशासन जन को अर्पित |
दलित-शोषितों को नियमों से,मिलीं शक्तियां श्रेष्ठ  अकल्पित |
हर घर तक पहुंची यह धारा,भारत का गणतन्त्र हमारा |

हुई शक्तियां संवैधानिक , लिखित हो गयीं सब अधिकाधिक |
संविधान अतिश्रेष्ठ बना कर, संसद से करवाया     पारित |
जग में ज्यों चमका ध्रुव तारा,भारत का गणतन्त्र हमारा |

शासन जन का जन के द्वारा,है सशक्त जनप्रतिनिधि हमारा |
नियम बनाना,राज चलाना , संसद में सिमटा बल  सारा |
शासक-शासन सभी संवारा ,भारत का गणतन्त्र हमारा |
   धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,खटीमा-२६२३०८(उ०ख०)
      मो. ०९४१०७१८७७७


             धमकी देकर 
                    - डा.राज सक्सेना
               बना दो यह सम्भव हे राम |
धमकी देकर डंसते कैसे, ये मच्छर बदनाम |
कान अगर मिलते हाथी से, कितने आते काम |
             बना दो यह सम्भव हे राम |
यदि जिराफ सी गर्दन होती,हम खजूर खा आते,
सबसे ऊंची डाल पे लटका,सेब तोड़ कर   खाते |
घर में बैठे-बैठे खाते,    छत पर पड़े बादाम |
              बना दो यह सम्भव हे राम |
सारस सी टांगें मिल जातीं,ओलम्पिक में जाते ,
पदक जीतकर सभी दौड़ के,हम भारत जब आते |
एरोड्रम पर करने आते, हमको सभी  सलाम |
              बना दो यह सम्भव हे राम |
पेट जो मिलता ऊंट सरीखा, जब दावत मे जाते,
पन्द्रह दिन का खाना खाकर्,घर वापस हम आते |
हफ्तों-हफ्तों करते रहते,    घर में ही आराम |
              बना दो यह सम्भव हे राम |
बन्दर जैसी तरल चपलता,थोड़ी सी पा   जाते ,
छीन कचौड़ी मां के कर से,बैठ पेड़ पर   खाते |
बदले में मां को ला देते, पके डाल के   आम |
              बना दो यह सम्भव हे राम |
गरूण सरीखे पर मिल जाते, विश्व घूमकर आते,
दिल्ली से न्युयार्क मुफ्त में, निशिदिन आते-जाते |
एयर टिकिट न लेना पड़ता, खर्च न  होते दाम |
              बना दो यह सम्भव हे राम |

   धनवर्षा,हनुमान मन्दिर ,खटीमा-२६२३०८ (उ०ख०)


           कैसा मामा किसका मामा
                                     - डा. राज सक्सेना 
कैसा मामा किसका मामा,चंदा लगता किसका मामा  |

क्या मामा धरती पर आया ,क्या आकर हमको दुलराया ,.
साथ ले गया कभी गगन में,तारा मंडल भी दिखलाया !
झूठ बोलते खा -मो -खामा,कैसा मामा किसका मामा !

कभी नहीं बाज़ार घुमाया, कभी नहीं पिज्जा खिलवाया,
न बन्दर सी खों-खों करके,जब रोते हम कभी हंसाया !
फिसले तो ना बाजू थामा,कैसा मामा किसका मामा !

कभी नहीं जंगल दिखलाया,ना भालू से कभी मिलाया,
गिफ्ट नहीं कोई दिलवाई,नहीं कथा किस्सा सुनवाया !
ना ढपली न सा रे गा मा,कैसा मामा किसका मामा !

मामा के संग बुढ़िया आती ,साथ एक चरखा  भी लाती,
हमें नई नानी मिल जाती,मौज हमारी तब बढ़ जाती !
खादी का  सिलती पजामा,कैसा मामा किसका मामा !

मामा है तो अब भी आये,अपने रथ पर हमें बिठाये,
दूर गगन की सैर कराकर,अच्छी-अच्छी कथा सुनाये !
और अधिक न दे अब झामा ,कैसा मामा किसका मामा !

    -धन वर्षा ,हनुमान मंदिर,खटीमा-262308 (उ.ख)
      मो.- 09410718777


           ये तारे सब खोटे
                   - डा. राज सक्सेना 
एक दिवस तारे सब मिलकर,
चंदा के घर  आये |
चंदा की मम्मी से सबने,
मीठे बोल सुनाये |

मम्मी तुम चंदा भैया का,
ध्यान नहीं कुछ रखतीं,
इतना बड़ा हो गया फिर भी,
ब्याह नहीं क्यों करतीं |

क्यों बूढा करतीं भैया को,
जल्दी ब्याह  करा दो |
सुन्दर सी एक नई नवेली ,
उसको दुल्हन ला दो |

चन्दा की मम्मी सुन बोली,
कैसे ब्याह  करादूं |
घटे बढे जो रोज  इसी सी,
दुल्हन कैसे ला दूँ |

दिवस अमावस का जब होगा,
कैसे सबर करेगी |
साथ इसी के वह कोमल भी, 
हर क्षण सफ़र करेगी  |

ये है पुरुष नियति है इसकी,
अजब  खेल  यह खेले |
पर जो बंधे साथ में  इसके,
वह क्योँ यह सब झेले |

सुन संतुष्ट हुए तारे सब, 
अपने घर सब लौटे |
चन्दा ने माँ पर भेजे थे,
ये तारे सब खोटे |

    -धन वर्षा, हनुमान मंदिर,
खटीमा-262308 (उ.ख)
मो.  09410718777    

   छोटा हूं इतना
मां मैं क्यों छोटा हूं इतना |
नहीं बड़ा क्यों भय्या जितना |

सब बातों मैं मुझे दबाता ,
छोटा कह कर चुप कर जाता |

फील्ड किनारे मुझे बिठाकर, 
घन्टों खेले मुझे दिखा कर |

छ्त पर मुझे नहीं ले  जाता |
पर खुद जाकर पतंग उड़ाता |

खुद तो छिप कर चाट उड़ाये,
मिर्च बहुत कह मुझे डराये |

जा मित्रों में  गप्प  लड़ाता,
मैं जो पहुंचूं तुरत  भगाता |

कहता है हर बात में  छोटा,
भय्या बड़ा ,बहुत है  खोटा |

मैं छोटा क्यों मुझे बता मां,
जल्दी मुझको बड़ा बना  मां |

बड़ा हुआ कुछ  काम करूंगा,
मां-पापा का   नाम करूंगा |

एक नया इतिहास   लिखूंगा,
जग में  रोशन नाम करूंगा |  

   प्यारी गौरय्या
पहले भोर हमारे आंगन,
आ जाती थी एक गौरय्या |
बहुत दिनों से नहीं दिखरही,
इधर फुदकती वह गौरय्या |

बचा रात का अन्न पड़ा जो,
फुदक-फुदककर वह खाजाती |
कभी अगर ज्यादा दिखता तो,
वह परिवार बुला ले  आती  |

चारों ओर घुमा कर गरदन,
झट से चोंच चला जाती थी |
एक किनारे से फुदकी और,
छोर दूसरे   आ  जाती थी |

नन्हे-नन्हे  बच्चे   उसके,
उसकी  तरह फुदक जाते थे |
नकल उसी की कर आंगन में,
घंण्टों खेल  दिखा  जाते थे |

बहुत दिनों से आस-पास भी,
नहीं दिख रही  वह गौरय्या |
मां हम से कुछ भूल हुई क्या,
क्यों नाराज  हुई   गौरय्या | 

     विज्ञान कुण्डलियां
        -डा.राजसक्सेना 
गाड़ी पर उल्टा लिखा, एम्बुलेंस क्यों मित्र | 
आगे  गाड़ी जा रही, मिले मिरर को चित्र |
मिले मिरर को चित्र, सदा   उल्टा आएगा ,
सीधा लिख दें अगर,  पढा   कैसे जाएगा |
कहे'राजकविराय',  इसी से उल्टा लिखते,
बैकव्यु मिरर में देख, उसे हम सीधा पढते |
          -०-
जले बल्ब स्विचआन से,ट्यूब लगाये देर |
पप्पू के मस्तिष्क में,घूम रहा  यह फेर |
घूम रहा यह फेर, सुनो पप्पू   विज्ञानी,
ट्यूब बिजली के मध्य,चोक स्टार्टर ज्ञानी |
कहे'राजकविराय',पहुंचती जब दोनों  में,
लेती थोड़ी देर , इसी से वह उठने  में |
          -०-
पप्पू मारे हाथ, समझ में कुछ न आता |
क्यों आता है ज्वार,और क्यों आता भाटा |
और् क्यों आता भाटा,लहर यूं बनती क्यों है,
ऊंची उठती लहर,पुनः फिर गिरती क्यों है |
कहे'राजकविराय'गुरुत्वधरा चन्दा से ज्यादा,
इसी वजह से नित्य,ज्वार और भाटा आता |
          -०-
पप्पू फ्रिज जब खोलता,फ्रीजर ऊपर होय |
सब में ऊपर देखकर,सिर धुनना ही होय |
सिरधुनना ही होय,खेल ये समझ नआया ,
फ्रीजर ऊपर बना रहा है,हर फ्रिज  वाला |
कहे'राज'हवा गर्म, नीचे से ऊपर उठती,
ऊपर फ्रीजर से टकराकर, ठंडी हो  जल्दी |
           -०-
पृथ्वी अपने अक्ष पर, झुक साढे  तेईस |
करती है वह परिक्रमा,गिन कर पूरी तीस |
गिनकर पूरी तीस,ऋतु बदले सूर्य किरन से,
मध्य, मकर, कर्क रेखा पर चाल बदल के |
कहे'राजकविराय', गर्म-ठंडी या तम देखो,
सीधी पड़ती गर्म , नही तो ठंडा क्रम देखो |
           -०-

      दुखियों पर दया
पशुओं पर दया नहीं जिसको,
वह पशुवत है इन्सान  नहीं |
अपनापन पशु से रखता हो,
वह ही मानव, इंसान वही |

देकर दधीचि ने अस्थि-दान,
मानवकुल का कल्याण किया |
शिवि ने बहेलिये निष्ठुर  को,
खग रक्षा में निजमांस दिया |
जो काम और के आ  जाये,
लगता है तब भगवान वही |
अपनापन पशु से रखता हो,
वह ही मानव, इंसान वही |

महाराज रन्तिदेव ने अपना,
भोजन तक सबको दे डाला |
भगवान बुद्ध ने दुखहरण हेतु,
एक नया धर्म ही रच डाला |
सम्पूर्ण राज्य और वैभव का,
समझा कणभर भी मूल्य नहीं |
अपनापन पशु से रखता हो,
वह ही मानव, इंसान वही |

ईसामसीह ने आगे बढ कर,
संदेश दिया था जनता  को |
तीर्थंकर महावीर श्री स्वामी ने,
था श्रेष्ठ कहा इस क्षमता को |
जितने भी महापुरुष जग के,
कहते  रहते थे बात  यही |
अपनापन पशु से रखता हो,
वह ही मानव, इंसान वही |

गांधी ने इस युग में आकर,
इस दया भाव को अपनाया |
आदर्श बने इस के कारण ,
जिसको जग भर ने अपनाया |
उन्नति का है यह मूलमंत्र ,
संशय इसमें है नहीं  कहीं |
अपनापन पशु से रखता हो,
वह ही मानव, इंसान वही |

          तीनों बन्दर
               -डा.राज सक्सेना
गांधी जी के तीनों बन्दर ,
बैठे बाल-पार्क के अन्दर |
सुखकरजीवन को जीने के,
बांट रहे हैं सबको मन्तर |

हाथ कानपर रखकर भोला,
हम सबसे यह मन्तर बोला |
नहीं किसी की सुनो बुराई,
सुखी रहोगे राज ये खोला |

हाथ आंख पर रखकर भाई,
कह्ता यह मत देख बुराई |
अच्छा अच्छा सबकुछ देखो,
नहीं किसी से ठने लड़ाई |

मुख पर हाथ रखे जो रहता,
हाथ हटा कर हम से कहता |
मैं मन्तर यह बता रहा हूं ,
बुरा न बोले सुख से रहता |

बापू ने यह सूत्र    सुझाये ,
बन्दर तीन प्रतीक  बनाये |
सत्य,शान्ति,सुख रहे हमेशा,
इनके माध्यम से सिखलाये |
 
   धनवर्षा,हनुमान मन्दिर,
खटीमा-२६२३०८ (उ०खण्ड)
मो- ०९४१०७१८७७७